बहुत मुश्किल है अंजना, चित्रा और रुबिका के दौर में — निधि कुलपति होना।

बहुत मुश्किल है अंजना, चित्रा और रुबिका के दौर में — निधि कुलपति होना।

एक ऐसे समय में जब तेज़ आवाज़ को पत्रकारिता समझ लिया गया है, वहाँ किसी का शांत रह जाना — विद्रोह जैसा लगता है।

निधि जी को मैं कभी व्यक्तिगत रूप से नहीं जान पाया, लेकिन पत्रकारिता पढ़ने दौरान उन्हें देखने और सुनने का मौका मिलता — तो पहली बार जाना कि विनम्रता भी नेतृत्व कर सकती है।

वो कैमरे पर थीं, लेकिन कभी 'कैमरा-लायक़' बनने की कोशिश नहीं की। उनकी मौजूदगी शांत थी — लेकिन असर गहरा। जैसे पुराने रेडियो की आवाज़ — जिसमें कोई जल्दबाज़ी नहीं होती, पर जो दिल तक उतर जाती है।

उन्होंने कभी ऊँचा बोलने की ज़रूरत महसूस नहीं की, क्योंकि उनकी गरिमा ही उनकी ताक़त थी।

आज जब वे एनडीटीवी से रिटायर हो रही हैं — तो ऐसा लग रहा है जैसे कोई दीपक बुझा नहीं है, बस अब वो दीया और भीतर जलने लगा है।

निधि जी, आपका जाना एक युग का जाना है — लेकिन आपकी शैली, आपकी सादगी, आपकी आवाज़ — हम जैसे अनगिनत पत्रकारों के भीतर जीवित रहेगी।

आपने हमें सिखाया — कि पत्रकारिता शोर से नहीं, संवेदनशीलता से चलती है।

#घोरकलजुग #NidhiKulpati

Comments

Popular posts from this blog

पहलगाम आतंकी हमले की दास्तान अमरेंद्र कुमार सिंह जी की जुबानी

मीना मंच सुगमकर्ताओं की दो दिवसीय कार्यशाला का हुआ समापन, खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा प्रमाण पत्र किए गए वितरित

ऑपरेशन सिंदूर से बौखलाया पाकिस्तान; पूंछ में निर्दोष नागरिकों से ले रहा बदला, 15 की मौत