स्मार्ट मीटर: जनता की ज़रूरत या उद्योगपतियों का फायदा?

बिजली मीटर एक ऐसा यंत्र जो हमारे घरों में बैठा हर यूनिट का हिसाब रखता है, उसी के दम पर बिजली का बिल बनता है। यानी ये छोटा-सा डिब्बा ही तय करता है कि आपकी जेब पर कितना बोझ पड़ेगा। लेकिन अब सवाल यह है क्या इसका उन्नत या ‘स्मार्ट’ होना जरूरी है या सिर्फ दिखावा?
1995-96 से राजस्थान में तत्कालीन राजस्थान राज्य विद्युत मंडल (RSEB) के जमाने से पुराने मीटर हटाकर नई टेक्नोलॉजी वाले मीटर लगाए जा रहे हैं, वो भी तब जब पुराने मीटर बिल्कुल ठीक चल रहे थे। क्यों? 
क्योंकि कुछ कंपनियों ने मीटर में थोड़े-बहुत फीचर जोड़ दिए। 20 साल की उम्र वाले मीटरों को बीच में ही बदल दिया गया, और इसके लिए हजारों करोड़ खर्च कर दिए गए और ये बोझ सीधे उपभोक्ताओं की जेब पर गया।

अब सरकार कह रही है कि पुराने मीटर हटा कर 1 करोड़ से ज्यादा स्मार्ट मीटर लगाए जाएं। ये मीटर दूर बैठे रीडिंग भेजेंगे, खुद से बिजली काटेंगे और खपत का लाइव डेटा दिखाएंगे। सुनने में तो हाईटेक लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि जो काम लाइनमैन करता है चोरी पकड़ना, मीटर जांचना, लोगों से संपर्क रखना वो एक मशीन नहीं कर सकती।
इस ‘स्मार्ट मीटर क्रांति’ की कीमत? करीब ₹10,000 करोड़। इसमें से सिर्फ 15% यानी ₹900 प्रति मीटर की मदद केंद्र देगा, बाकी राज्य और उपभोक्ता खुद उठाएं। और अगर राज्य ने नहीं किया तो केंद्र ₹5,400 करोड़ की सहायता रोक देगा। यानी या तो मीटर लगाओ, या सजा भुगतो।

इतना ही नहीं सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना के तहत हर घर में एक और स्मार्ट मीटर लगेगा ताकि सौर ऊर्जा की निगरानी हो सके। मतलब कुल खर्च होगा ₹20,000 करोड़ के आसपास! लेकिन क्या इस भारी-भरकम खर्च से बिजली सस्ती होगी? बिल कम आएगा? नहीं।

असल में ये पैसा ट्रांसफॉर्मर, तारों और सबस्टेशनों को दुरुस्त करने में लगे तो रोज़ाना के कटौती, दुर्घटनाएं और फाल्ट कम हो सकते हैं। हर साल 368 लोगों की जान बिजली हादसों में जाती है इन पर खर्च जरूरी है, मीटर की चमक पर नहीं।

तो सवाल बड़ा सीधा है:
क्या हम उपभोक्ता स्मार्ट मीटर के नाम पर केवल कुछ कंपनियों की जेब भरने का जरिया बन रहे हैं?
या अब समय आ गया है कि बिजली व्यवस्था को सच में ‘स्मार्ट’ बनाया जाए जनता के लिए, न कि मुनाफे के लिए?

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