“सोलर पैनल नहीं तो सैलरी नहीं!” — यह आदेश है या अंधेरगर्दी?
“सोलर पैनल नहीं तो सैलरी नहीं!” — यह आदेश है या अंधेरगर्दी?
मऊ जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा यह कहा जाना कि सोलर पैनल न लगवाने पर वेतन रोक दिया जाएगा, न सिर्फ चौंकाने वाला है बल्कि कानून, संविधान और सामान्य बुद्धि—तीनों का खुला अपमान है।
पहला सवाल— सोलर पैनल लगवाना शिक्षक का कर्तव्य कब से हो गया? सेवा नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। जब कर्तव्य ही नहीं, तो दंड किस बात का?
दूसरा सवाल— वेतन रोकने का अधिकार बीएसए/बीईओ को किस कानून ने दिया? वेतन रोकना दंडात्मक कार्यवाही है, जो केवल विधिवत विभागीय प्रक्रिया और सेवा नियमों के तहत ही हो सकती है। मनमर्जी से नहीं।
संविधान साफ कहता है—🔹 अनुच्छेद 300A: वेतन कर्मचारी की वैध संपत्ति है, बिना कानून उसे छीना नहीं जा सकता।
🔹 अनुच्छेद 21: वेतन रोककर कर्मचारी और उसके परिवार को भूखा रखना जीवन के अधिकार पर हमला है।
🔹 अनुच्छेद 14: मनमाने आदेश समानता के अधिकार के खिलाफ हैं।
अगर सरकार चाहती है कि विद्यालयों में सोलर पैनल लगें, तो 👉 व्यवस्था सरकार करेगी, खर्च सरकार उठाएगी। कर्मचारी से “पहले पैसे लगाओ, वरना सैलरी भूल जाओ” कहना कानून नहीं, धमकी है। यह आदेश अदालत में एक दिन भी नहीं टिकेगा। यह विकास नहीं, प्रशासनिक दबंगई है।
यह पर्यावरण संरक्षण नहीं, कर्मचारियों का शोषण है। अब सवाल शिक्षकों से है— 👉क्या हम हर गैरकानूनी आदेश को चुपचाप स्वीकार करते रहेंगे? या कानून और संविधान के साथ खड़े होंगे?
सोलर पैनल लगाना लक्ष्य हो सकता है, लेकिन वेतन रोकना अपराध है।
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