आगरा में ‘मरा हुआ’ आदमी 13 साल बाद स्कूटर चलाते मिला, 6 पुलिसकर्मियों पर FIR

उत्तर प्रदेश के आगरा से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां जमीन विवाद से बचने के लिए एक व्यक्ति ने खुद को ही “मृत” घोषित करा दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि वह 13 साल तक कागजों में मरा हुआ रहा, लेकिन असल जिंदगी में आराम से घूमता रहा। अब इस पूरे प्रकरण में छह पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है और जांच शुरू हो गई है।
1999 में शुरू हुआ था विवाद-:
यह मामला साल 1999 का है, जब सिकंदरा के औद्योगिक क्षेत्र स्थित रूबी टावर की जमीन को लेकर विवाद हुआ था। इस मामले में वादी राजकुमार वर्मा के पिता मदन गोपाल ने विद्या देवी, ताराचंद और अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।काफी समय तक मामला अदालत में चलता रहा। आखिरकार वर्ष 2011 में अदालत ने आरोपी ताराचंद के खिलाफ गैर-जमानती वारंट और कुर्की के आदेश जारी कर दिए।
कुर्की से बचने के लिए खुद को ‘मरा’ घोषित कर दिया-:
आरोप है कि कुर्की और गिरफ्तारी से बचने के लिए ताराचंद ने अपने बेटे गिरीश चंद, घनश्याम दास उर्फ राजू टंडन और राजकुमार वर्मा उर्फ टीटू के साथ मिलकर एक फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनवा लिया। इसके आधार पर अदालत में यह दिखा दिया गया कि ताराचंद की मौत हो चुकी है।
कागजों में ताराचंद मर चुका था, इसलिए उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई भी ठंडी पड़ गई।
13 साल बाद खुला राज
यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 5 नवंबर 2025 को वादी पक्ष के राजकुमार वर्मा ने अचानक ताराचंद को शहर में स्कूटर चलाते हुए देख लिया। उन्होंने तुरंत उसकी फोटो खींच ली और इसे अदालत में सबूत के तौर पर पेश कर दिया।
फोटो देखकर अदालत भी हैरान रह गई। इसके बाद जांच के आदेश दिए गए और मामला थाना न्यू आगरा थाना को सौंप दिया गया।
पुलिस जांच में खुला सच
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि ताराचंद ने वर्ष 2016 में अपने नाम से एक स्कूटी भी खरीदी थी, यानी वह सालों से सामान्य जिंदगी जी रहा था।
13 जनवरी 2026 को थाना न्यू आगरा ने अदालत में रिपोर्ट दाखिल कर बताया कि ताराचंद जीवित है। इसके बाद कोर्ट ने कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए।
6 पुलिसकर्मियों पर भी केस
मामले में फर्जी दस्तावेज तैयार करने और गलत रिपोर्ट लगाने के आरोप में छह पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। पुलिस अब पूरे प्रकरण की गहराई से जांच कर रही है कि आखिर इतने साल तक यह फर्जीवाड़ा कैसे चलता रहा।
सवालों के घेरे में व्यवस्था
यह मामला सामने आने के बाद कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं—
आखिर एक जिंदा व्यक्ति को कागजों में मृत कैसे घोषित कर दिया गया?
पुलिस और प्रशासन की भूमिका क्या थी?
और सबसे बड़ा सवाल, क्या ऐसे और भी मामले फाइलों में दबे पड़े हैं?
आगरा का यह मामला अब सिर्फ जमीन विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और फर्जीवाड़े का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है।

Comments

Popular posts from this blog

पहलगाम आतंकी हमले की दास्तान अमरेंद्र कुमार सिंह जी की जुबानी

मीना मंच सुगमकर्ताओं की दो दिवसीय कार्यशाला का हुआ समापन, खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा प्रमाण पत्र किए गए वितरित

ऑपरेशन सिंदूर से बौखलाया पाकिस्तान; पूंछ में निर्दोष नागरिकों से ले रहा बदला, 15 की मौत